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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं तौ स्वर्णविकृतान्विमुञ्चन्तौ महाशरान् |  ३८   क
आकाशं संवृतं वीरावुल्काभिरिव चक्रतुः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति