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वन पर्व
अध्याय १५३
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वैशम्पाय़न उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु प्रगृहीतशिलाय़ुधाः |  २९   क
प्रादुरासन्महाकाय़ास्तस्योद्यानस्य रक्षिणः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति