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विराट पर्व
अध्याय ६४
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वैशम्पाय़न उवाच
मनुष्यलोके सकले यस्य तुल्यो न विद्यते |  १४   क
यः समुद्र इवाक्षोभ्यः कालाग्निरिव दुःसहः |  १४   ख
तेन भीष्मेण ते तात कथमासीत्समागमः ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति