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शल्य पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
जहि राजन्रथानीकमश्वाः सर्वे जिता मय़ा |  ९   क
नात्यक्त्वा जीवितं सङ्ख्ये शक्यो जेतुं युधिष्ठिरः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति