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शान्ति पर्व
अध्याय २३०
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व्यास उवाच
पौरुषं कर्म दैवं च फलवृत्तिस्वभावतः |  ५   क
त्रय़मेतत्पृथग्भूतमविवेकं तु केचन ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति