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वन पर्व
अध्याय २३०
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वैशम्पाय़न उवाच
अथ दुर्योधनो राजा शकुनिश्चापि सौवलः |  १७   क
दुःशासनो विकर्णश्च ये चान्ये धृतराष्ट्रजाः |  १७   ख
न्यहनंस्तत्तदा सैन्यं रथैर्गरुडनिस्वनैः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति