आदि पर्व  अध्याय ९६

वैशम्पाय़न उवाच

ते चापि वृहती श्यामे नीलकुञ्चितमूर्धजे |  ५४   क
रक्ततुङ्गनखोपेते पीनश्रोणिपय़ोधरे ||  ५४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति