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वन पर्व
अध्याय २३०
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रमथ्य गन्धर्वांस्तद्वनं विविशुर्वलात् |  ५   क
सिंहनादेन महता पूरय़न्तो दिशो दश ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति