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शान्ति पर्व
अध्याय २३१
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शुक उवाच
मनसश्चेन्द्रिय़ाणां चाप्यैकाग्र्यं समवाप्यते |  ४   क
येनोपाय़ेन पुरुषैस्तच्च व्याख्यातुमर्हसि ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति