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द्रोण पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
वीरसूर्वीरपत्नी त्वं वीरश्वशुरवान्धवा |  १७   क
मा शुचस्तनय़ं भद्रे गतः स परमां गतिम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति