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वन पर्व
अध्याय २४५
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वैशम्पाय़न उवाच
न सुष्वाप सुखं राजा हृदि शल्यैरिवार्पितैः |  ४   क
दौरात्म्यमनुपश्यंस्तत्काले द्यूतोद्भवस्य हि ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति