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वन पर्व
अध्याय २३१
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वैशम्पाय़न उवाच
तदिदं कृतं नः प्रत्यक्षं गन्धर्वैरतिमानुषम् |  १७   क
दिष्ट्या लोके पुमानस्ति कश्चिदस्मत्प्रिय़े स्थितः |  १७   ख
येनास्माकं हृतो भार आसीनानां सुखावहः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति