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वन पर्व
अध्याय २३१
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वैशम्पाय़न उवाच
तान्दृष्ट्वा द्रवतः सर्वान्धार्तराष्ट्रान्पराङ्मुखान् |  २   क
दुर्योधनो महाराज नासीत्तत्र पराङ्मुखः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति