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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
स कीर्यमाणो निशितैः कर्णचापच्युतैः शरैः |  १०१   क
नगराद्रिवनप्रख्यस्तत्रैवान्तरधीय़त ||  १०१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति