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शान्ति पर्व
अध्याय २३२
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व्यास उवाच
विधूम इव दीप्तार्चिरादित्य इव दीप्तिमान् |  १८   क
वैद्युतोऽग्निरिवाकाशे पश्यत्यात्मानमात्मना |  १८   ख
सर्वं च तत्र सर्वत्र व्यापकत्वाच्च दृश्यते ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति