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शान्ति पर्व
अध्याय २३२
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व्यास उवाच
योगकृत्यं तु ते कृत्स्नं वर्तय़िष्यामि तच्छृणु |  २   क
एकत्वं वुद्धिमनसोरिन्द्रिय़ाणां च सर्वशः |  २   ख
आत्मनो ध्याय़िनस्तात ज्ञानमेतदनुत्तमम् ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति