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वन पर्व
अध्याय २३२
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वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्य तु तां श्रुत्वा प्रतिज्ञां सत्यवादिनः |  २१   क
कौरवाणां तदा राजन्पुनः प्रत्यागतं मनः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति