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सभा पर्व
अध्याय ५२
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वैशम्पाय़न उवाच
याज्ञसेन्याः परामृद्धिं दृष्ट्वा प्रज्वलितामिव |  ३२   क
स्नुषास्ता धृतराष्ट्रस्य नातिप्रमनसोऽभवन् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति