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शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
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जनमेजय़ उवाच
यत्राविशन्ति कल्पान्ते सर्वे व्रह्मादय़ः सुराः |  ६   क
ऋषय़श्च सगन्धर्वा यच्च किञ्चिच्चराचरम् |  ६   ख
न ततोऽस्ति परं मन्ये पावनं दिवि चेह च ||  ६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति