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वन पर्व
अध्याय २३३
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वैशम्पाय़न उवाच
नैतद्गन्धर्वराजस्य युक्तं कर्म जुगुप्सितम् |  १२   क
परदाराभिमर्शश्च मानुषैश्च समागमः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति