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द्रोण पर्व
अध्याय १२४
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सञ्जय़ उवाच
धनञ्जय़सखा यश्च धनञ्जय़हितश्च यः |  १८   क
तं धनञ्जय़गोप्तारं प्रपद्य सुखमेधते ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति