वन पर्व  अध्याय २३३

वैशम्पाय़न उवाच

यदि साम्ना न मोक्षध्वं गन्धर्वा धृतराष्ट्रजम् |  १८   क
मोक्षय़िष्यामि विक्रम्य स्वय़मेव सुय़ोधनम् ||  १८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति