वन पर्व  अध्याय २३३

वैशम्पाय़न उवाच

तथैव शरवर्षेण गन्धर्वास्ते वलोत्कटाः |  २०   क
पाण्डवानभ्यवर्तन्त पाण्डवाश्च दिवौकसः ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति