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वन पर्व
अध्याय २३३
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वैशम्पाय़न उवाच
तान्रथान्साधु सम्पन्नान्संय़ुक्ताञ्जवनैर्हय़ैः |  ४   क
आस्थाय़ रथशार्दूलाः शीघ्रमेव यय़ुस्ततः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति