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शान्ति पर्व
अध्याय २३४
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शुक उवाच
क्षरात्प्रभृति यः सर्गः सगुणानीन्द्रिय़ाणि च |  १   क
वुद्ध्यैश्वर्याभिसर्गार्थं यद्ध्यानं चात्मनः शुभम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति