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शान्ति पर्व
अध्याय ४९
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वासुदेव उवाच
अराजके जीवलोके दुर्वला वलवत्तरैः |  ६२   क
वाध्यन्ते न च वित्तेषु प्रभुत्वमिह कस्यचित् ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति