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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो यय़ुः पाण्डुसुता व्राह्मणान्स्वस्ति वाच्य च |  १८   क
अर्चय़ित्वा सुरश्रेष्ठं पूर्वमेव महेश्वरम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति