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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽथ वरदो देवस्तान्सर्वानमरान्स्थितान् |  ५१   क
अशरीरो वभाषेदं वाक्यं खस्थो महेश्वरः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति