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शान्ति पर्व
अध्याय २३४
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व्यास उवाच
व्रह्मचर्येण वै लोकाञ्जय़न्ति परमर्षय़ः |  ६   क
आत्मनश्च हृदि श्रेय़स्त्वन्विच्छ मनसात्मनि ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति