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वन पर्व
अध्याय २३४
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वैशम्पाय़न उवाच
गदाशक्त्यसिवृष्टीस्ता निहत्य स महास्त्रवित् |  १३   क
गात्राणि चाहनद्भल्लैर्गन्धर्वाणां धनञ्जय़ः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति