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वन पर्व
अध्याय २३४
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वैशम्पाय़न उवाच
शिरोभिः प्रपतद्भिश्च चरणैर्वाहुभिस्तथा |  १४   क
अश्मवृष्टिरिवाभाति परेषामभवद्भय़म् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति