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वन पर्व
अध्याय २३४
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वैशम्पाय़न उवाच
ते दह्यमाना गन्धर्वाः कुन्तीपुत्रस्य साय़कैः |  १८   क
दैतेय़ा इव शक्रेण विषादमगमन्परम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति