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वन पर्व
अध्याय २३४
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वैशम्पाय़न उवाच
चत्वारः पाण्डवा वीरा गन्धर्वाश्च सहस्रशः |  २   क
रणे संन्यपतन्राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति