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अनुशासन पर्व
अध्याय १
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भीष्म उवाच
एवं ज्ञात्वा कथं मां त्वं सदोषं सर्प मन्यसे |  ५०   क
अथ चैवङ्गते दोषो मय़ि त्वमपि दोषवान् ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति