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वन पर्व
अध्याय २३४
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वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवाः सर्वे संहृतास्त्रं धनञ्जय़म् |  २७   क
सञ्जह्रुः प्रद्रुतानश्वाञ्शरवेगान्धनूंषि च ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति