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वन पर्व
अध्याय २२०
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मार्कण्डेय़ उवाच
ऐरावतस्य घण्टे द्वे वैजय़न्त्याविति श्रुते |  १८   क
गुहस्य ते स्वय़ं दत्ते शक्रेणानाय़्य धीमता ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति