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शान्ति पर्व
अध्याय २३५
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व्यास उवाच
स चक्रचरलोकानां सदृशीं प्राप्नुय़ाद्गतिम् |  २४   क
यतेन्द्रिय़ाणामथ वा गतिरेषा विधीय़ते ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति