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वन पर्व
अध्याय २३५
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वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातींस्तानवमुच्याथ राजदारांश्च सर्वशः |  १८   क
कृत्वा च दुष्करं कर्म प्रीतिय़ुक्ताश्च पाण्डवाः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति