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वन पर्व
अध्याय २३५
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वैशम्पाय़न उवाच
मा स्म तात पुनः कार्षीरीदृशं साहसं क्वचित् |  २१   क
न हि साहसकर्तारः सुखमेधन्ति भारत ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति