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वन पर्व
अध्याय २३५
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चित्रसेन उवाच
वनस्थान्भवतो ज्ञात्वा क्लिश्यमानाननर्हवत् |  ४   क
इमेऽवहसितुं प्राप्ता द्रौपदीं च यशस्विनीम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति