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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
मन्वन्तराणि गावश्च चन्द्रमाः सविता हरिः |  २२   क
सावित्री व्रह्मविद्या च ऋतवो वत्सराः क्षपाः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति