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वन पर्व
अध्याय २३६
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जनमेजय़ उवाच
कत्थनस्यावलिप्तस्य गर्वितस्य च नित्यशः |  २   क
सदा च पौरुषौदार्यैः पाण्डवानवमन्यतः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति