शान्ति पर्व  अध्याय २३७

शुक उवाच

वर्तमानस्तथैवात्र वानप्रस्थाश्रमे यथा |  १   क
योक्तव्योऽऽत्मा यथा शक्त्या परं वै काङ्क्षता पदम् ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति