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शान्ति पर्व
अध्याय २३७
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व्यास उवाच
विमुक्तं सर्वसङ्गेभ्यो मुनिमाकाशवत्स्थितम् |  २२   क
अस्वमेकचरं शान्तं तं देवा व्राह्मणं विदुः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति