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शान्ति पर्व
अध्याय २३७
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व्यास उवाच
कषाय़ं पाचय़ित्वा तु श्रेणिस्थानेषु च त्रिषु |  ३   क
प्रव्रजेच्च परं स्थानं परिव्रज्यामनुत्तमाम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति