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वन पर्व
अध्याय २३७
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दुर्योधन उवाच
समावृता दिशो दृष्ट्वा पाण्डवेन शितैः शरैः |  १३   क
धनञ्जय़सखात्मानं दर्शय़ामास वै तदा ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति