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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
यस्य वाहुवलं सर्वे समाश्रित्य महात्मनः |  २०   क
वनवासान्निवृत्ताः स्म न च युद्धेषु निर्जिताः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति