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वन पर्व
अध्याय २३८
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दुर्योधन उवाच
न ह्यहं प्रतिय़ास्यामि पुरं शत्रुनिराकृतः |  १२   क
शत्रुमानापहो भूत्वा सुहृदां मानकृत्तथा ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति