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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
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वासुदेव उवाच
अहं गुरुर्महावाहो मनः शिष्यं च विद्धि मे |  ४५   क
त्वत्प्रीत्या गुह्यमेतच्च कथितं मे धनञ्जय़ ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति