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वन पर्व
अध्याय २३८
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वैशम्पाय़न उवाच
भ्रातॄन्पालय़ विस्रव्धं मरुतो वृत्रहा यथा |  २३   क
वान्धवास्त्वोपजीवन्तु देवा इव शतक्रतुम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति