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वन पर्व
अध्याय २३८
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वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणेषु सदा वृत्तिं कुर्वीथाश्चाप्रमादतः |  २४   क
वन्धूनां सुहृदां चैव भवेथास्त्वं गतिः सदा ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति